सुप्रीम कोर्ट ने वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन के लिए आधार को मंजूरी दी | बिहार के मतदाताओं को बड़ी राहत

मतदाता सत्यापन के लिए आधार कार्ड को 12वें प्रमाण पत्र के रूप में मान्यता मिली।

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Image Credit : Pixabey/Lakshmiprasad s

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप करते हुए चुनाव आयोग (ECI) को आदेश दिया है कि बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में आधार कार्ड को 12 वैध दस्तावेज़ों में से एक के रूप में शामिल किया जाए। यह फैसला लोकतंत्र के लिए एक बड़ा सुधार माना जा रहा है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि प्रक्रियात्मक जटिलताएँ लाखों योग्य नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित न करें।

चुनाव आयोग ने पहले आधार को खारिज करते हुए यह तर्क दिया था कि यह केवल निवास का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। लेकिन न्यायालय ने इस तर्क को अव्यवहारिक करार देते हुए स्पष्ट किया कि यदि पासपोर्ट और जन्म प्रमाण पत्र को छोड़कर बाकी 11 दस्तावेज़ नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं, तो केवल आधार को अलग क्यों रखा गया?

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि बिहार की लगभग 90% आबादी के पास आधार कार्ड है, जबकि पासपोर्ट केवल 2% लोगों के पास है। ऐसे में आधार को हटाकर पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों को प्राथमिकता देना गरीब और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए गंभीर समस्याएँ खड़ी करता।

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चुनाव आयोग की जल्दबाज़ी में की गई प्रक्रिया के चलते अब तक 65 लाख से अधिक मतदाता ड्राफ्ट रोल से बाहर हो चुके हैं। वरिष्ठ राजनितिक विश्लेषकों के अनुसार इस बहिष्कार में कई विसंगतियाँ सामने आईं—बड़ी संख्या में महिलाओं को हटाया गया, कुछ इलाकों में असामान्य मृत्यु दर दिखाई दी, और प्रवासी मज़दूरों व विवाहित महिलाओं को संदिग्ध तरीके से “स्थायी रूप से स्थानांतरित” मान लिया गया। यह दर्शाता है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता और सटीकता की कमी रही।

आधार को वैध दस्तावेज़ मानने से अब दो बड़े लाभ होंगे—

1. वे 65 लाख से अधिक मतदाता, जिन्हें गलत तरीके से सूची से हटा दिया गया था, फिर से जोड़े जा सकेंगे।

2. पहले से शामिल मतदाताओं के लिए सत्यापन प्रक्रिया आसान हो जाएगी।

यह फैसला उन राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं की अपील को भी सही ठहराता है, जो लगातार चेतावनी दे रहे थे कि आधार को खारिज करना जमीनी स्तर पर गंभीर दिक्कतें पैदा कर रहा है और यह सर्वोच्च न्यायालय के पुराने निर्देशों का उल्लंघन है।

न्यायालय के आदेश से चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रियाओं को जमीनी हकीकत के अनुरूप ढालना होगा। यह फैसला केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में मतदाता सूची के संशोधनों के लिए एक मिसाल बनेगा।

आगे चलकर चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि मतदाता सूची सटीक और समावेशी बने। इसके लिए जल्दबाज़ी से बचते हुए घर-घर जाकर गहन सत्यापन किया जाए, ताकि भारत के लोकतंत्र की नींव—मतदाता सूची—मजबूत और निष्पक्ष बनी रहे।

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