काठमांडू।
नेपाल ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है — वरिष्ठ अधिवक्ता सबिता भंडारी को औपचारिक रूप से देश का पहला महिला अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया गया है। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने यह निर्णय अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की सिफारिश पर 14 सितंबर 2025 को लिया।
यह नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले इस सर्वोच्च कानूनी पद पर केवल पुरुषों का कब्जा रहा है।
संवैधानिक प्रक्रिया और पृष्ठभूमि:

- नेपाल का संवैधान अलग-अलग प्रावधानों के साथ काम करता है। संविधान, धारा 157(2) के अनुसार, अटॉर्नी जनरल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सिफारिश पर की जाती है।
- इस पद की अवधि “प्रधानमंत्री की संतुष्टि के अनुसार (during the pleasure of the Prime Minister)” होती है, अर्थातंतु सरकार बदलने या राजनीतिक स्थिति बदलने पर यह पद रिक्त हो सकता है।
- शिक्षा और पेशेवर योग्यता के मामले में, अटॉर्नी जनरल बनने के लिए Supreme Court के न्यायाधीश बनने की योग्यता होनी चाहिए।
नामांकन के कारण और संदर्भ:
- इससे पहले रमेश बादल इस पद पर थे, जिन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया था।
- दायित्वों में सरकार को कानूनी सलाह देना, संवैधानिक एवं विधिक मामलों में सरकार की ओर से मुकदमे लड़ना और न्यायपालिका में देश के हितों का बचाव करना शामिल है।
विवाद और आलोचनाएँ:
- सबिता भंडारी की नियुक्ति विवादों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। एक बड़ा मुद्दा है कि उन्होंने संदीप लामिछाने के बचाव पक्ष में काम किया था, जिन पर एक नाबालिग से यौन शोषण (rape) का आरोप है। इस कारण उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
- आलोचकों का मानना है कि सरकारी मुकदमों और सामाजिक न्याय की चुनौतियों के समय इस तरह के मामलों में भूमिका निभाने वाले किसी व्यक्ति की न्यायिक व पेशेवर विश्वसनीयता महत्वपूर्ण होती है।
प्रभाव और प्रतीत संभावनाएँ:
- इस नियुक्ति से नेपाल में महिला नेतृत्व को एक नई पहचान मिली है। सुशीला कार्की के साथ, जो कि नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री हैं, यह एक संकेत है कि राजनीतिक और प्रशासनिक स्तरों पर लैंगिक समावेशिता (gender inclusion) को बढ़ावा मिल रहा है।
- न्यायलय और विधिक प्रणाली में इस कदम को एक प्रेरणादायक उदाहरण माना जा रहा है, जो अन्य लैंगिक रूप से अल्पसंख्यक वर्गों के लिए भी उम्मीद लेकर आता है।
- हालांकि, इसके साथ ही यह देखा जाना है कि सरकार कैसे इस नियुक्ति से जुड़ी पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है, विशेषकर ऐसे मामलों में जहाँ बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के बीच संघर्ष हो।
प्रस्तावित आगे की दिशा:
- अटॉर्नी जनरल कार्यालय को चाहिए कि वह मुकदमे चलाने, मामलों की निगरानी और न्यायपालिका के समक्ष सरकारी मामलों की प्रस्तुति में निष्पक्षता बनाए रखे।
- सामाजिक न्याय, उल्लिखित आरोपों की पारदर्शी जांच और न्याय सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र संस्थाएं और मानवाधिकार निगरानी समूह सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।
- सरकार को चाहिए कि अटॉर्नी जनरल की नियुक्ति व निर्णयों से संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक हों, ताकि नागरिक स्तर पर विश्वास बना रहे।
निष्कर्ष:
सबिता भंडारी की नियुक्ति नेपाल के लिए एक प्रतीक बन चुकी है — एक महिला जो कानूनी सर्वोच्चता के स्तर पर पहुंची हैं। यह न केवल उनके व्यक्तिगत करियर का गौरव है, बल्कि समाज की परिवर्तनशीलता और लैंगिक समानता के संघर्ष की जीत भी है। लेकिन इसके साथ ही न्याय, पारदर्शिता और जिम्मेदारी से जुड़े विवाद इस नई भूमिका की चुनौतियों को उजागर करते हैं।