वैज्ञानिकों ने कोलंबिया के पहाड़ी इलाकों से मिले लगभग 5,500 साल पुराने एक मानव कंकाल में सिफलिस से जुड़े बैक्टीरिया के प्रमाण खोजे हैं। यह खोज मानव रोगों के इतिहास को लेकर बनी उस धारणा को चुनौती देती है, जिसके अनुसार ऐसी बीमारियाँ केवल खेती और घनी आबादी की शुरुआत के बाद ही फैलीं। प्राचीन DNA के इस अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि खतरनाक पैथोजन इंसानों को हजारों साल पहले भी संक्रमित कर रहे थे।

कोलंबिया के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लगभग 5,500 साल पुराने एक व्यक्ति की हड्डियों से वैज्ञानिकों को ऐसा प्रमाण मिला है, जिसने सिफलिस जैसी बीमारियों के इतिहास को लेकर बनी पुरानी धारणाओं को चुनौती दे दी है। रिसर्च के दौरान उस व्यक्ति की पैर की हड्डी में Treponema pallidum नामक बैक्टीरिया का प्राचीन DNA पाया गया, जो आज सिफलिस, यॉज़ और बेजेल जैसी बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
अब तक यह माना जाता रहा था कि इस तरह के बैक्टीरिया इंसानों में तब फैले, जब लोग इंटेंसिव खेती करने लगे और घनी आबादी वाले इलाकों में रहने लगे। लेकिन यह खोज बताती है कि ये पैथोजन खेती की शुरुआत से हजारों साल पहले भी इंसानों को संक्रमित कर रहे थे, उस समय जब लोग छोटे-छोटे शिकारी-संग्रहकर्ता समूहों में रहते थे और लगातार यात्रा करते थे।
कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी, सांता क्रूज़ की रिसर्चर नसरीन ब्रूमंदखोशबख्त के अनुसार, यह खोज पूरी तरह अप्रत्याशित थी क्योंकि कंकाल में संक्रमण के कोई स्पष्ट निशान मौजूद नहीं थे। इसके बावजूद, जीनोमिक विश्लेषण ने साफ तौर पर Treponema pallidum की मौजूदगी को साबित कर दिया।
स्विट्जरलैंड की लॉज़ेन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेविड बोज़ी का कहना है कि यह खोज इस बैक्टीरिया और इंसानी आबादी के बीच लंबे समय से चले आ रहे रिश्ते को उजागर करती है। जब रिसर्च टीम ने इस प्राचीन जीनोम की तुलना आधुनिक स्ट्रेन्स से की, तो पता चला कि यह एक बिल्कुल अलग और अब तक अज्ञात वंश से जुड़ा हुआ था।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बैक्टीरिया संभवतः Treponema carateum से जुड़ा हो सकता है, जो पिंटा नाम की स्किन डिज़ीज़ का कारण बनता है और जिसे अब तक केवल शारीरिक लक्षणों के आधार पर जाना गया था, न कि जेनेटिक सबूतों से।
इस खोज ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या अतीत में Treponema बैक्टीरिया के कई ऐसे वंश मौजूद थे, जो अब विलुप्त हो चुके हैं और अलग-अलग बीमारियों का कारण बनते थे। विशेषज्ञों का कहना है कि इन पुराने जीनोम्स का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करेगा कि कैसे पैथोजन समय के साथ विकसित होकर नई बीमारियाँ पैदा करने लगे।